माँ का साया
माँ का साया सहमा सा एक नव दिवस उस वक़्त स्पर्श किया मैंने अपनी आँखों को महसूस कुछ गीला है जब छुआ मैंने पलकों को अब ये ऐसा क्यों है? अविदित मत हो इतना भी वो रैन का रोना , छलकी बूंदो में सोना वो अम्बिका की अनमोल माया जरा सा बिछड़ गया बस माँ का साया । बचपन जैसे याद बन गया वो कालिमा का टीका कहाँ है अब कहाँ गया वो आनंद उन हाथों का करीना सिरोरुह सहलाने का कहाँ है अब वो छोटी - छोटी गलतियों स्नेह भरी मार कहाँ है अब ...