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तुम्हारे निहारने से। (A heartly Poem)

मेरी प्यासी आंखों में समंदर- सा छा जाता है         और छलक जाता है वो पानी का दरिया, जिसमे तुम्हारी हर अदा छिपी है  अब और क्या तारीफ़ करू,     मुझे तो सुकून मिल जाता है          बस तुम्हारे पलट कर निहारने से...    अब सुनना पसंद नहीं है                    वो सितार का संगीत, क्योंकि तुम्हारी पायलों की                  झनझनाहट जो करीब है,   अब देखना पसंद नहीं वो T.V वाला कथक,        क्योंकि तुम्हारी उंगलियों के नृत्य में जो संजोग है           मुझे कुछ तो मिल जाता है,        जब घर के आंगन में तुम बिखरी रहती हो            और बहुत कुछ मिल जाता है,            बस तुम्हारे पलट कर निहारने से.. बहुत सुंदर चित्रकारी छोड़ दी है मैंने,    बस अब तुम्हारी तस्वीर बनाने में लगा हूं ...

सच बोलकर रुलाने वाले..

सोचो तो बहुत कुछ, वरना कुछ भी नहीं,     ज़्यादा नहीं तो, थोड़ा ही सही मगर सच्चाई से वाक़िफ तो हम होते हैं,  और हां एक बात और सुनो...      मिलेंगे बहुत शख़्स झूठ बोलकर हंसाने वाले,       लेकिन सच बोलकर रुलाने वाले बहुत कम होते हैं..

माँ का साया

                 माँ का साया       सहमा सा एक नव दिवस      उस वक़्त स्पर्श किया मैंने अपनी आँखों को             महसूस कुछ गीला है       जब छुआ मैंने पलकों को          अब ये ऐसा क्यों है?       अविदित मत हो इतना भी     वो रैन का रोना , छलकी बूंदो में सोना    वो अम्बिका की अनमोल माया       जरा सा बिछड़ गया बस माँ का साया ।                         बचपन  जैसे याद बन गया       वो कालिमा का टीका कहाँ है अब           कहाँ गया वो आनंद उन हाथों का         करीना सिरोरुह सहलाने का कहाँ है अब               वो छोटी - छोटी गलतियों                    स्नेह भरी मार कहाँ है अब   ...